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इधर फूंक मारी..उधर पता चल जाएगा शुगर लेवल, युवती ने बनाई अनोखी मशीन; पीएम मोदी भी कायल

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बालाघाट के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के विद्यार्थियों ने शानदार नवाचार किया है. इसकी मदद से सिर्फ फूंक मारकर ही शुगर लेवल का पता लगाया जा सकेगा. देखिए खास रिपोर्ट…

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बालाघाट

बालाघाट की पल्लवी का पीएम मोदी ने किया सम्मान 

बालाघाट. बालाघाट के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के विद्यार्थियों ने प्रोफेसर की मदद से एक शानदार नवाचार किया है. अब सिर्फ फूंक मारकर ही शुगर लेवल का पता लगाया जा सकेगा. इसके लिए प्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन करने वाली पल्लवी ऐड़े को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहा है. दरअसल, कॉलेज के प्रोफेसर और विद्यार्थियों ने मिलकर एक ऐसा उपकरण तैयार किया है, जिसमें शरीर से बिना खून निकाले ही शुगर लेवल का पता लगाया जा सकता है. लोकल 18 उस कॉलेज पहुंचा और इस प्रोजेक्ट के बारे में जानने की कोशिश की…

पल्लवी के दिल्ली पहुंचने की पूरी यात्रा
बालाघाट के कॉलेज में अध्यनरत पल्लवी ऐड़े ने बताया कि वह और उनकी टीम इस प्रोजेक्ट पर लम्बे समय तक काम कर रही थी. उनकी टीम ने युवा उत्सव में भाग लिया, जिसके बाद जिला स्तर पर उनका चयन हुआ. इसके बाद संभाग और राज्य स्तर पर मॉडल सिलेक्ट हुआ. फिर पल्लवी को अपने प्रोजेक्ट को दिल्ली के भारत मंडपम में पेश करने का मौका मिला. यहां पर विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित हुई, जिसमें सभी राज्यों से लोगों भाग लिया था. केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया को उनके मॉडल को पीएम गैलरी के लिए चुना.

मॉडल देख पीएम मोदी ने की तारीफ
पल्लवी इस प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन दिया, जिसे देख पीएम मोदी मॉडल की जमकर तारीफ की. उन्होंने पूरे प्रोजेक्ट की जानकारी ली. साथ ही उनकी टीम के बारे में भी पुछा. इसके बाद वह काफी खुश हुए.

जानें क्या है मॉडल का कॉन्सेप्ट
दरअसल, शुगर की जांच के लिए शरीर से खुन निकालना पड़ता है. ऐसे में इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए इस यंत्र का आविष्कार हुआ है. कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. दुर्गेश अगासे ने बताया कि इस मशीन की मदद से किसी का खून निकाले बगैर किसी का भी शुगर लेवल जांच सकते हैं. उन्होंने बताया कि शुगर के मरीजों में किटोजेनिक मेटाबॉलिज्म शुरू हो जाता है. उसके अंदर किटोन बॉडी का निर्माण शुरू हो जाता है. फिर किटॉन में उपस्थित एसिटोन उनकी सांस में आने लगता है. ऐसे में एसिटोन और ग्लूकोज का संबंध का अध्ययन किया गया. फिर इस आधार पर इस मशीन का आविष्कार हो पाया है. उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे पहले यह विचार साल 2017 में आया, जिसका पेटेंट साल 2023 में किया गया.

इस मॉडल में इंजीनियरिंग की अहम भूमिका
एसिटोन और ग्लूकोज का संबंध का अध्ययन किया गया. इसके अनुपात को स्पष्ट करने के लिए कोडिंग की गई. दोनों के संबंध को स्थापित करने के लिए फिर प्रोग्रामिंग की गई . ऐसे में इंजीनियरिंग की मदद से यह प्रोजेक्ट पूरा हो पाया. आपको बता दें कि इस प्रोजेक्ट के लिए कोडिंग हर्ष तिवारी ने की थी.

एक्युरेसी पर काम जारी
डॉ. अगासे ने बताया कि हम लोग इसकी एक्युरेसी पर काम कर रहे हैं. इसके लिए अलग-अलग संस्थाओं से मदद ली जा रही है. वहीं, इस पर काम पूरा हो जाने के बाद मार्केट में मौजूद शुगर मापने वाले यंत्रों के साथ तुलना की जाएगी. फिर किसी स्टार्टअप के बाद मार्केट में लॉन्च की जाएगी.

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