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पेरू के रहने वाले गोताखोर अलेजांद्रो ‘विली’ (Alejandro “Willy” Ramos Martinez) ने 10 साल पहले समंदर में डुबकी लगाई, तभी एक दुर्घटना में उनके शरीर के अंदर नाइट्रोजन घुस गया और उनकी बॉडी चलते-फिरते गुब्बारे जैसी हो गई. डीकंप्रेसन सिकनेस के इस अनोखे मामले का इलाज डॉक्टर भी नहीं खोज पाए हैं, जबकि विली अब भी अपनी जान बचने को चमत्कार मानते हैं.

समुद्र की गहराइयों से रोजी-रोटी कमाने वाले डाइवर्स के सामने कई खतरे मंडराते रहते हैं, लेकिन पेरू के एक मछुआरे के साथ जो हुआ, वह दुनिया भर के चिकित्सा विज्ञान के लिए भी एक पेचीदा पहेली बन गया है. एक साधारण सी डाइविंग दुर्घटना ने एलेजांद्रो “विली” रामोस मार्टिनेज (Alejandro “Willy” Ramos Martinez) की जिंदगी बदल कर रख दी. पेशे से गोताखोर रहे एलेजांद्रो ने आज से 10 साल पहले समंदर में डुबकी लगाई थी, लेकिन तभी एक दुर्घटना में उनका ऑक्सीजन पाइप फट गया. ऐसे में तेजी से पानी की सतह पर आने के कारण उनके शरीर में नाइट्रोजन के बुलबुले ऐसे फंसे कि आज तक नहीं निकल पाए हैं. इस दुर्लभ स्थिति के कारण उनका शरीर किसी गुब्बारे की तरह फूल गया है. यह मामला दुनिया में अपनी तरह का अनोखा है, जहां डॉक्टर्स भी इसका स्थायी इलाज ढूंढ पाने में असमर्थ हैं.
यह घटना साल 2013 की है, जब पेरू के पिस्को तट के पास एलेजांद्रो 30 मीटर से अधिक गहराई में समुद्री भोजन (सीफूड) की तलाश में गोताखोरी कर रहे थे. तभी एक गुजरती नाव ने उनकी ऑक्सीजन की होज पाइप फट गई. ऐसे में उन्हें अपनी जान बचाने के लिए बहुत तेजी से पानी की सतह पर आना पड़ा. गहरे पानी के दबाव से अचानक बाहर आने की इस प्रक्रिया ने उनके शरीर में “डिकंप्रेशन सिकनेस” या “चैम्बर सिकनेस” नामक गंभीर स्थिति पैदा कर दी. इस स्थिति में शरीर के ऊतकों और खून में घुली नाइट्रोजन गैस अचानक बुलबुले बना लेती है. विली के मामले में ये बुलबुले उनकी छाती और बाजुओं में जमा हो गए, जिससे उनका सीना, पेट और बांहें लगातार सूजने लगीं और एक फूले हुए गुब्बारे की तरह दिखने लगीं. आज उनकी दोनों बाइसेप्स का घेरा लगभग 62 सेमी और 72 सेमी तक पहुंच चुका है.
चिकित्सा विज्ञान के लिए यह मामला इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि डिकंप्रेशन सिकनेस के आम लक्षणों में दर्द, हड्डी व जोड़ों का नुकसान या नर्वस सिस्टम प्रभावित होना शामिल है. लेकिन विली जैसी शारीरिक विकृति (Deformities) दुर्लभ है. डॉक्टरों ने प्रेशराइज्ड चैम्बर में ऑक्सीजन देकर उनके शरीर के लगभग 30% नाइट्रोजन बुलबुलों को खत्म करने में सफलता पाई थी, लेकिन 8 साल बीत जाने के बाद भी बाकी बुलबुले उनके मांसपेशियों और अंगों से चिपके हैं. सर्जरी का भी विकल्प नहीं है, क्योंकि बुलबुले अंगों के साथ इतने गहरे जुड़े हैं कि उन्हें निकालना जानलेवा हो सकता है. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में विली ने कहा, “मैं चमत्कार से बच गया था. ईश्वर का शुक्र है कि मैं विकृत हूं, लेकिन जिंदा हूं.” उन्होंने यह भी कहा कि एक समय वह डिप्रेशन में चले गए थे, लोगों की हमदर्दी सहन नहीं कर पाते थे, लेकिन अब उस मुश्किल दौर से उबर चुके हैं.
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें
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