Headlines

गोविंद निहलानी की फिल्मों ने सामाजिक मुद्दों को नई पहचान दी.

[ad_1]

नई दिल्ली. फिल्म निर्माता-निर्देशक गोविंद निहलानी समानांतर या आर्ट सिनेमा को नई दिशा देने वाले डायरेक्टर के तौर पर जाने जाते हैं. उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए सामाजिक मुद्दों को गहराई से उठाया और कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते.

गोविंद निहलानी की पहली निर्देशित फिल्म ‘आक्रोश’ साल 1980 में आई, जिसे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए गोल्डन पीकॉक अवॉर्ड मिला था. ‘आक्रोश’ एक कानूनी ड्रामा थी, जिसमें ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल और अमरीश पुरी जैसे एक्टर्स ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं. फिल्म को जाने माने मराठी नाटककार विजय तेंदुलकर ने लिखी थी. यह फिल्म सामाजिक अन्याय और दलित मुद्दों पर आधारित थी, जिसने दर्शकों और आलोचकों का दिल जीता. श्याम बेनेगल के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी.

1983 से 1987 तक मचाया धमाल

इसके बाद गोविंद निहलानी ने साल 1983 में ‘अर्ध सत्य’ निर्देशित की, जो एसडी पनवलकर की कहानी पर आधारित थी. यह पुलिस व्यवस्था और नैतिकता पर गहरी टिप्पणी करने वाली फिल्म थी. 1997 में उन्होंने बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘हजार चौरासी की मां’ पर आधारित फिल्म बनाई, जो नक्सलवाद और मां के दर्द को पर्दे पर बखूबी पेश करती है.

इन फिल्मों के लिए मिले अवॉर्ड

गोविंद निहलानी को उनकी फिल्मों ‘आक्रोश’, ‘अर्ध सत्य’, ‘दृष्टि’, ‘हजार चौरासी की मां’, ‘तमस’, ‘विजेता’, ‘देव’, ‘कलयुग’ और ‘कुरुतिपुनल’ के लिए कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं. इसके अलावा ‘जुनून’, ‘विजेता’, ‘आक्रोश’, ‘अर्ध सत्य’ और ‘देव’ जैसी फिल्मों के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स से भी नवाजा गया है. ‘तमस’ एक टेलीविजन सीरीज थी, जो विभाजन के दंगों पर आधारित थी और इसे भी खूब सराहना मिली.

बता दें कि फिल्म जगत को गंभीर विषयों पर एक से बढ़कर एक फिल्म देने वाले गोविंद निहलानी का जन्म सिंध (अब पाकिस्तान) में हुआ था. विभाजन के दौरान उनका परिवार जोधपुर चला गया और बाद में उदयपुर में बस गया. वहां उनके पिता अनाज के व्यापारी बने. एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि फिल्मों का शौक कैसे लगा. उन्होंने बताया था कि सिनेमाघरों में अंग्रेजी फिल्में देखने जाते थे. साथ ही फोटोग्राफी का जुनून भी चढ़ा, जो बाद में सिनेमेटोग्राफी की ओर ले गया. उदयपुर में शिक्षा पूरी करने के बाद 18 साल की उम्र में जब फिल्मों में करियर बनाने की इच्छा जताई, तो इस फैसले से पिता चौंक गए, क्योंकि उस समय फिल्म इंडस्ट्री को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था. गोविंद ने पहले सिनेमेटोग्राफर के रूप में काम किया और फिर निर्देशन में कदम रखा.

[ad_2]

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *