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जानवरों के बीच भी होती है सरहद, वाकई अलग ही दिखते हैं आवास, क्या आप जानते हैं इसका नाम?

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जानवरों के आवासों में भी इलाके कहीं कहीं बंटे लगते हैं जहां लगता है कि बीच में एक सरहद है. वालेस लाइन नाम की यह सरहद दक्षिणपूर्व एशिया में मौजूद है, जिसके एक तरफ एशियाई तो दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलियाई प्रजातियां रहत…और पढ़ें

जानवरों के बीच भी होती है सरहद, वाकई अलग ही दिखते हैं आवास, क्या है इसका नाम?

वालेस लाइन एक तरह से जानवरों के आवास की सरहद होती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

हाइलाइट्स

  • वालेस लाइन दक्षिणपूर्व एशिया में स्थित है
  • यह एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई प्रजातियों को अलग करती है
  • वालेस लाइन के दोनों तरफ जलवायु और भोजन में अंतर है

आपने सुना होगा कि सरहदें केवल इंसानों के लिए होती हैं. पर क्या अगर कहा जाए कि ऐसा नहीं है. बल्कि असल में जानवरों के लिए भी सरहदें होती हैं. ऐसा आज के दौर में नहीं बल्कि बहुत पहले हो रहा है. इस तरह की सरहदों को वैज्ञानिकों ने भी एक नाम दिया है कि वे इस वालेस लाइन कहते हैं. कई जगह तो इसे देख कर ही साफ साफ समझा भी जा सकता है. तो आइए जानते है कि ये वालेस लाइन क्या है और किस तरह से यह सरहद की तरह काम करती है.

किसी तरह की सरहद
जेम्स कुक यूनिवर्सिटी में इकोलॉजिकल रिसर्चर डॉ. पेनी वैन ओस्टरज़ी ने सालों तक ऐसे इलाकों का अध्ययन किया है जहां इस तरह की वालेस लाइन होती दिखती है. उनका कहना है कि कई रुकावटें ऐसी होती हैं जिनकी वजह से पास होने के बाद भी आवास अलग अलग बंट जाते हैं.

कहां है ये वालेस लाइन?
वालेस लाइन दक्षिणपूर्व एशिया में है. जो एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई प्रजातियों के बीच में साफ तरह से अंतर करती है. यह बोर्नेयो और सुलावेसी की बीच के और बाली और लोमबोक के बीच के पानी से हो कर गुजरती है जो करीब केवल 15 मील ही दूरी पर हैं. आधिकारिक तौर पर सरहद ना होने पर भी यह कई जानवरों के लिए सरहद है.

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वालेस लाइन के दोनों तरफ जानवरों की यहां तक कि पंछियों की भी अलग अलग तरह की प्रजातियां दिखती हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)

खास तरह की जगह
दिलचस्प बात ये है कि यहां मकासार जलसंधि एक अहम स्थान है. यहां एक गहरी महासागरीय खाई है, जिसकी वजह से सदियों पहले जब समुद्र का जल स्तर गिरा था, बहुत बहुत से द्वीप तो आपस में जुड़े थे. लेकिन  जमीन कभी भी इस खाई के कारण जुड़ नहीं पाई. यही कारण हैं कि दोनों ही तरफ के आवासों में जमीन आसमान का अंतर है और दोनों तरफ की प्रजातियों के जानवरों, दूसरी तरफ की जलवायु और यहां तक कि भोजन भी नहीं सुहाता है. इसीलिए पक्षी तक आर पार आते जाते नहीं दिखते.

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इस लाइन को वालेस नाम एक वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वालेस की वजह से मिला है. उन्होंने डार्विन के अलावा स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक चयन की धारणा पर लिखा था. उनके अध्ययन से इस विचार को बल मिला था कि प्रजातियां केवल अपने वातावरण के आधार पर ही पनपती हैं. बाद में वालेस लाइन भौगोलिक विभाजन वाले अलग अलग आवासीय इलाकों का प्रतीक बन गई. वहीं कुछ अध्ययन यह भी दावा करते हैं कि वालेस लाइन समय के साथ अपना स्थान भी बदलती है.

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