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Drone Anatomy Young Indians creating History: करीब 15 साल पहले आई ‘ थ्री ईडियट्स (3 Idiots)’ मूवी में रेंचो इंजीनियरिंग की डिग्री के पीछे भागते अपने अपने दोस्तों से कहता है कि ‘सफलता नहीं काबिलियत के पीछे भागो, कामयाबी झक मारकर पीछे आएगी’. यह डायलॉग सुना तो बहुत लोगों ने था लेकिन जिन लोगों ने इसे अपने जीवन का मंत्र बना लिया, वे आज दुनिया में छा जाने की तैयारी कर रहे हैं. डिग्री को काफी पीछे छोड़कर 3 राज्यों से आए ये 3 युवा आज ड्रोन टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के क्षेत्र में पीएम मोदी के मेक इन इंडिया से भी एक कदम आगे बढ़कर उस सपने को साकार करने में लगे हैं, जब दुनिया के आसमान में कोई भी ड्रोन उड़े तो उस पर लिखा हो, ‘डिजाइंड, इंजीनियर्ड एंड बिल्ट इन भारत’.
यूपी के गाजियाबाद में ये 3 युवा ड्रोन की डिजाइन तय करने से लेकर बनाने तक का काम खुद ही कर रहे हैं.
दो लोगों ने मिलकर साल 2017 तक न केवल ड्रोन बनाए, बल्कि शादियों और फंक्शनों में बारात और मेहमानों के ऊपर फूल गिराने वाले करीब 20 से ज्यादा ड्रोन बेचकर भी दिखाए. साल 2018 में इन्हें एक और साथी मिला दीपांशु पुरोहित और फिर इन्होंने मिलकर ड्रोन एनाटॉमी की स्थापना की. अब इन तीनों को साफ हो चुका था कि उन्हें न केवल ड्रोन ही बनाने हैं, बल्कि एकदम स्वदेशी और मेक इन इंडिया के तहत अलग-अलग जरूरतों के लिए कस्टमाइज्ड ड्रोन बनाने हैं. इन तीनों ने मिलकर रिसर्च एंड डेवलपमेंट किया और ड्रोन के क्षेत्र में आ रहीं रुकावटों, कमियों को पहचानकर ऐसे ड्रोन बनाना शुरू किया जो बाजार में मौजूद ड्रोनों के मुकाबले,कीमतों में सस्ते,पोर्टेबल और वजन में सबसे हल्के, भारी वजन को लेकर उड़ने में सक्षम, ऑपरेट करने में बेहद आसान और लेटेस्ट तकनीक से लैस थे .
खूब हुआ एडवेंचर
ड्रोन एनाटॉमी की 14 युवाओं की टीम दिन रात मेहनत कर सेना के लिए भी ड्रोन तैयार कर रही है.
छोड़ दी डिग्री की पढ़ाई
ड्रोन बनाने की इस जर्नी में सबसे दिलचस्प है कि इन तीनों ही युवाओं ने 12वीं तक अच्छी तरह पढ़ाई की लेकिन अपनी डिग्री की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी. यहां तक कि सौरभ झा का नंबर एनआईआईटी में भी आ गया, लेकिन ड्रोन की यात्रा को बाधित करना उन्होंने ठीक नहीं समझा और इंजीनियरिंंग छोड़ दी. मयंक ने रिटेल की जॉब और कॉमर्शियल डिग्री छोड़ दी, जबकि दीपांशु ने मैनेजमेंट की डिग्री बीच में छोड़कर ड्रोन में प्रयोग करना जारी रखा.
डीजीसीए से मिली मंजूरी
इस एग्री ड्रोन को डीजीसीए ने मंजूरी दी है.
कृषि और डिफेंस दो क्षेत्रों को प्रमुखता से लेकर आगे बढ़ रहे इन युवाओं ने अपनी टीम बढ़ाकर 14 कर ली और देखते ही देखते सबसे हल्के एग्री ड्रोन को बना लिया. इस ड्रोन की खास बात है कि यह चाइनीज फ्रेम के बजाय भारत में मौजूद एल्यूमिनियम जैसी धातु से बना है. इसमें 80 फीसदी सामान भारत का लगा है. इसकी खासियतों को देखते हुए करीब 3 महीने पहले ही डायरेक्ट्रेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) ने इसे मंजूरी दी है और अब इसे सुरक्षित ड्रोन की तरह खेतों में फर्टिलाइजर के छिड़काव के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. जहां 5 एकड़ खेत में दवा के छिड़काव के लिए मैन्यूअली 200 लीटर पानी लगता है और पूरा दिन लगता है, यह ड्रोन महज 7 मिनट में 10 पानी में इतना काम कर देता है.
भारतीय सेनाओं के लिए बना रहे ड्रोन
ड्रोन एनाटॉमी के फाउंडर सौरभ झा ने बताया कि उन्होंने भारतीय सेनाओं के लिए भी कई तरह के ड्रोन बनाए हैं, कुछ सेनाओं में इस्तेमाल हो रहे हैं और कुछ अभी नई तकनीक और अपडेशन के साथ डिजाइन किए जा रहे हैं. ये ड्रोन वजन भी लेकर जा सकते हैं. इंडियन आर्मी के साथ मिलकर ड्रोन इनोवेशन में बड़ा काम किया जा रहा है.
गाजियाबाद में छोटी सी जगह से की शुरुआत
ड्रोन सिर्फ शादियों में नहीं उड़ते, ये सेना की भी बड़ी ताकत बनने जा रहे हैं.
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