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दिल्ली चांदनी चौक ब्लास्ट: टेलीग्राम सीक्रेट चैट से साजिश, जांच कठिन

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दिल्ली के लाल किला ब्लास्ट की जांच में यह सामने आया है कि आरोपियों ने Telegram की सीक्रेट चैट का इस्तेमाल किया था. यह फीचर एंड टू एंड एन्क्रिप्शन, सेल्फ डिलीट मैसेज और बिना क्लाउड बैकअप के चलता है, जिसकी वजह से असली चैट तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है. जांच एजेंसियों को सिर्फ मेटाडाटा मिला है और अब वे पैटर्न एनालिसिस, लोकेशन डेटा और दूसरे डिजिटल क्लूज को जोड़कर नेटवर्क समझने की कोशिश कर रही हैं. यह मामला दिखाता है कि हाई एन्क्रिप्शन वाले मैसेजिंग टूल्स सुरक्षा जांच के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन चुके हैं.

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टेलीग्राम का वो फीचर जो बना आतंकियों का मददगार, दिल्ली ब्लास्ट से जुड़े तार

नई दिल्ली. 10 नवंबर को दिल्ली के चांदनी चौक में जो ब्लास्ट हुआ उसमें अब टेलीग्राम नाम की मैसेजिंग ऐप के इस्तेमाल की खबरें आ रही हैं. मिली जानकारी के अनुसार, आतंकियों ने टेलीग्राम के सीक्रेट चैट ऐप का इस्तेमाल करके हमले की प्लानिंग की. दिल्ली में लाल किला के पास हुए कार ब्लास्ट की जांच जैसे जैसे आगे बढ रही है, कई डिजिटल क्लू सामने आ रहे हैं. शुरुआती इनपुट में यह बात सामने आई कि आरोपियों ने Telegram के सीक्रेट चैट फीचर का इस्तेमाल किया था. यही फीचर अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बडा सिरदर्द बन गया है क्योंकि इसके जरिए भेजे गए मैसेज तक सीधे पहुंच पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

जांच टीम को सिर्फ मेटाडाटा जैसी बेसिक जानकारी मिली है जैसे लॉगइन टाइम और डिवाइस की डिटेल. लेकिन असली चैट अब भी हाथ नहीं लगी है. यही वजह है कि धमाके की प्लानिंग, टाइमलाइन और नेटवर्क को जोड़ना मुश्किल हो रहा है.

क्या है Telegram की सीक्रेट चैट

Telegram का सीक्रेट चैट मोड एंड टू एंड एन्क्रिप्शन पर चलता है. यानी मैसेज सिर्फ भेजने वाला और पाने वाला ही पढ़ सकता है. Telegram खुद भी चैट को नहीं देख सकता. इस मोड में स्क्रीनशॉट अलर्ट से लेकर सेल्फ डिलीट मैसेज टाइमर तक कई ऐसे फीचर हैं जो चैट को पूरी तरह छिपा देते हैं. इसी वजह से इसे हाई लेवल प्राइवेसी के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आम चैट क्लाउड पर सेव होती है लेकिन सीक्रेट चैट सिर्फ फोन से फोन तक चलती है. इसका मतलब यह है कि अगर डिवाइस न मिले तो चैट का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं रहेगा.

जांच एजेंसियों के लिए क्यों मुश्किल

लाल किला धमाके जैसे मामलों में जांच एजेंसियों को लीड तब मिलती है जब वे डिजिटल बातचीत को डिकोड करती हैं. लेकिन सीक्रेट चैट में न फॉरवर्डिंग होती है, न बैकअप बनता है और न ही चैट रिकवर की जा सकती है. इसी वजह से दिल्ली ब्लास्ट केस में बातचीत के सबूत मिल पाना बेहद कठिन हो गया है. एजेंसियां अब मेटाडाटा, लोकेशन पैटर्न, डिवाइस एक्टिविटी और एआई आधारित पैटर्न एनालिसिस के जरिए संदिग्ध गतिविधि जोड़ने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन सीधा मैसेज कंटेंट न मिलने से जांच की स्पीड पर फर्क पड़ा है.

टेक एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं

टेक विशेषज्ञों का मानना है कि सीक्रेट चैट को तोड़ना लगभग असंभव है लेकिन संदिग्ध व्यवहार को पहचानना मुमकिन है. जैसे अचानक कई अनजान कॉन्टैक्ट्स से चैट एक्टिविटी, रात के समय असामान्य लॉगइन, बार बार डिवाइस बदलना या एक ही अकाउंट का विभिन्न जगहों से सक्रिय होना. इन पैटर्न्स को एआई पकड़ सकता है और जांच में सुराग दे सकता है. हालांकि उनका यह भी कहना है कि भारत जैसे देश में डिजिटल प्राइवेसी और नेशनल सिक्योरिटी के बीच बैलेंस बनाना अब पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है.

लाल किला धमाके की जांच में अगला कदम

अब जांच टीम Telegram चैट्स से मिले मेटाडाटा को सीसीटीवी, कॉल रिकॉर्ड, फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन और फील्ड इनपुट के साथ मिला रही है. उम्मीद यही है कि इस पूरे नेटवर्क का ब्लूप्रिंट मेटाडाटा और एआई एनालिसिस के जरिए सामने आ सकेगा. दिल्ली ब्लास्ट केस ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि हाई एन्क्रिप्शन वाली मैसेजिंग ऐप्स कानून व्यवस्था के लिए बडी चुनौती बनती जा रही हैं और आने वाले समय में डिजिटल जांच का फोकस सिर्फ कंटेंट नहीं बल्कि पैटर्न एनालिसिस पर ज्यादा होगा.

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Jai Thakur

जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें

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