[ad_1]
Agency:Local18
Last Updated:
Unique Farming Event: कर्नाटक के उजिरे में उद्योगपति मोहन कुमार के नेतृत्व में ‘बदुकु कट्टोना बन्नी’ संस्था ने धान कटाई का उत्सव मनाया, जिसमें शहरी युवा, छात्र और स्वयंसेवी संगठनों ने भाग लिया.
मोबाइल-लैपटॉप छोड़ शहरी बाबू बने किसान
हाइलाइट्स
- कर्नाटक में धान कटाई उत्सव मनाया गया.
- शहरी युवाओं ने खेतों में कुदाल चलाया.
- ‘बदुकु कट्टोना बन्नी’ संस्था ने आयोजन किया.
दक्षिण कन्नड़: सोचिए, शहर के आरामदायक माहौल से निकलकर खेतों में कुदाल चलाना, पसीने से भीग जाना, फिर भी चेहरे पर मुस्कान बनी रहना. यही नजारा था कर्नाटक के उजिरे में, जहां अनंतोडी देवता के खेत में हजारों लोगों ने मिलकर धान की कटाई का उत्सव मनाया. बता दें कि यह सिर्फ एक खेती का काम नहीं था, यह अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश थी. उद्योगपति मोहन कुमार के नेतृत्व में ‘बदुकु कट्टोना बन्नी’ संस्था के संरक्षण में यह आयोजन हुआ, जिसमें न सिर्फ स्थानीय किसान बल्कि एसडीएम कॉलेज के छात्र, स्वयंसेवी संगठन और युवा भी शामिल हुए.
खेत में उतरे ‘शहरी बाबू’, बन गए किसान!
बता दें कि चारों तरफ हरियाली, माथे पर सूरज की तपिश, पैरों में कीचड़ और हाथ में कुदाल. ऐसा लगता था मानो कोई पुरानी फिल्म का सीन हो, शहरों में रहने वाले युवा, जो आमतौर पर मोबाइल और लैपटॉप में लगे रहते हैं, इस बार मिट्टी का सामना कर रहे थे.
करीब साढ़े चार एकड़ में फैले इस खेत में धान लहलहा रही थी और इसे काटने के लिए नज़ारे कुछ खास थे. पारंपरिक कपड़ों में सजे-धजे युवा, सिर पर टोपी, हाथ में कुदाल लेकर उतरे तो लगा मानो पुराने जमाने की कृषि परंपरा फिर से लौट आई हो.
जब खेत बना पाठशाला!
यह खेत श्री क्षेत्र धर्मस्थल का है और इसे इस बार खास मकसद से उपयोग किया गया—युवाओं को कृषि जीवन से जोड़ने के लिए. बुवाई से लेकर खाद डालने, रोपाई और अब कटाई तक, सारा काम युवाओं ने किया. उनके साथ गांव के अनुभवी किसान भी थे, जो अपने ज्ञान और अनुभव से उन्हें सही तकनीक सिखा रहे थे.
लोकल 18 से बात करते हुए एक युवा ने हंसते हुए कहा, “आज पहली बार समझ आया कि हमारे दादा-परदादा कितनी मेहनत करते थे. खाना थाली में आने तक कितना पसीना बहता है, ये हमने आज महसूस किया.”
यहां आधी रात को जागता है पूरा गांव, देवता निकलते हैं भ्रमण पर, लेकिन नहीं देख सकतीं महिलाएं
परंपरा और आध्यात्म का संगम
यह धान की कटाई किसी आम कृषि कार्य की तरह नहीं थी, इसमें आस्था और परंपरा का गहरा मेल था. कटाई के बाद धान को मंदिर के सामने पारंपरिक तरीके से भूसे से अलग किया गया. यह धान आगे मंदिरों में अन्नदान और देवता के नैवेद्य के लिए उपयोग किया जाएगा. वहीं, भूसे को गोशालाओं में भेजा जाएगा.
‘बदुकु कट्टोना’ ने दिया कृषि संस्कृति को जीवन
जब खेत बंजर हो रहे हैं, युवा कृषि से दूर जा रहे हैं, तब ‘बदुकु कट्टोना’ संस्था मिट्टी और मेहनत का महत्व सिखाने में लगी है.
February 11, 2025, 09:23 IST
[ad_2]
Source link