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शहादत की गवाही देता है ये स्मारक, गांधी जी के आह्वान पर हुआ था निर्माण, जानें दिलचस्प कहानी

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Agency:News18 Madhya Pradesh

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Balaghat News: बालाघाट, जिसे क्रांतिकारियों की भूमि कहा जाता है, महात्मा गांधी के आह्वान पर बनाया गया एक स्मारक आज भी वारासिवनी में मौजूद है. स्वतंत्रता सेनानी हरिशंकर अग्रवाल द्वारा बनवाया गया यह स्मारक, आज नि…और पढ़ें

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हाइलाइट्स

  • बालाघाट को क्रांतिकारियों की भूमि कहा जाता है।
  • गांधी जी के आह्वान पर हरिशंकर अग्रवाल ने स्मारक बनवाया।
  • वारासिवनी में दशाराम फुलमारी की प्रतिमा गोलीबारी चौक पर है।

बालाघाट. बालाघाट को क्रांतिकारियों की भूमि कहा जाता है. यहां पर 365 स्वतंत्रता सेनानी हुआ करते थे. इनमें सबसे ज्यादा वारासिवनी में 92 सेनानी थे. देश की आजादी के लिए जब कोई आंदोलन या सत्याग्रह होता था, यहां पर भी उसका बड़ा असर देखने मिलता था. वहीं, देश को आजादी मिली तो एक ने गांधी जी के आह्वान पर एक स्तंभ बना लिया. आज भी वह स्तंभ वही मौजूद है. देखिए लोकल 18 की खास रिपोर्ट में…

गांधी जी के आह्वान पर बनाया स्तंभ
वारासिवनी निवासी संजय अग्रवाल ने बताया कि 15 अगस्त 1947 में देश आजाद हुआ था. तब महात्मा गांधी ने देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों से आग्रह किया थी कि अपने-अपने शहर और कस्बे में एक आजादी के नाम स्मारक बनवाएं. ऐसे में वारासिवनी के स्वतंत्रता सेनानी हरिशंकर अग्रवाल ने खुद की लागत से एक स्मारक बनवाया, जो आज भी वारासिवनी में मौजूद है.

इसके बाद शासन ने बनवाए जय स्तंभ
आजादी के कुछ सालों के बाद सरकार ने हर शहर और कस्बे में जय स्तंभ बनवाए. ऐसे में हरिशंकर अग्रवाल ने जो स्मारक बनवाया था उस पर शासन ने ध्यान नहीं दिया. अब वह एक निजी स्मारक बन कर रह गया है. वहीं, हरिशंकर अग्रवाल के पोते संजय अग्रवाल ने बताया कि अब स्मारक को हम ही संरक्षित करके रखेंगे.

बालाघाट के एकमात्र शहीद स्वतंत्रता सेनानी इसी शहर में
गांधी जी के आह्वान पर साल 1942 में देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन हुआ था. ऐसे में यह आंदोलन बालाघाट के वारासिवनी में भी हुआ था, जिसमें जुलूस भी निकले. इस जुलूस में दशाराम फुलमारी सबसे आगे थे.

इस दौरान जुलूस ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया. ऐसे में हिंसा भड़क गई और आंदोलनकारियों ने पत्थर फेंके. तब सुपरिन्डेन्ट ने गोली चलाने का आदेश दिया. ऐसे में सबसे आगे दशाराम थे और 22 साल की उम्र में वह शहीद हो गए. साथ ही कई लोग इसमें घायल हो गए. अब उस चौक को गोलीबारी चौक के नाम से जाना जाता है. इसमें दशाराम उर्फ दाखिया की प्रतिमा भी रखी गई है.

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शहादत की गवाही देता है ये स्मारक, गांधी जी के आह्वान पर हुआ था निर्माण

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