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भारतीय क्रिकेटरों की अंग्रेजी सुधारने में बीसीसीआई की भूमिका

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भारतीय क्रिकेट टीम में पिछले कुछ सालों से क्रिकेटर छोटे गांवों और कस्बों से आ रहे हैं. वो अंग्रेजी जानते नहीं और इसको बोलने से डरते हैं लेकिन टीम में आते ही फर्राटे से इसको बोलने लगते हैं.

अंग्रेजी में तंग क्रिकेटर टीम इंडिया में आते ही कैसे हो जाते हैं इसके एक्सपर्ट

हाइलाइट्स

  • बीसीसीआई क्रिकेटरों को अंग्रेजी सिखाने पर जोर देता है
  • अंग्रेजी से दूर भागने वाले क्रिकेटर कैसे हो जाते हैं इसके एक्सपर्ट
  • छोटे गांवों कस्बों से आने वाले क्रिकेटरों की अंग्रेजी होती है तंग

भारत के 90 फीसदी क्रिकेटर अब छोटे गांवों-कस्बों और शहरों से आते हैं. उनकी बैकग्राउंड या माहौल ऐसा होता है कि वो अंग्रेजी में पैदल होते हैं. इसे बोलना उनके लिए सबसे डरने वाला काम होता है. टूटी-फूटी अंग्रेजी भी वो मुश्किल से ही बोल पाते हैं लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में आने के कुछ समय बाद ही वो सभी फर्राटे से इसे बोलने लगते हैं. आखिर कौन सी जादू की छड़ी इनके आगे घुमा दी जाती है कि जिस अंग्रेजी से ये अब तक डरते थे, उसे बोलने में एक्सपर्ट बन जाते हैं.

हर कोई जब उन्हें इस तरह अंग्रेजी बोलते सुनता है तो हैरान रह जाता है. वो आमतौर पर ऐसे घरों के होते हैं जिसमें अंग्रेजी बोलने का सवाल ही नहीं उठता. अंग्रेजी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी होती है. अगर मुंबई, दिल्ली और साउथ इंडिया से टीम इंडिया में आने वाले क्रिकेटर्स को छोड़ दें तो ज्यादातर क्रिकेटर्स की यही कहानी होती है.

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव पहले क्रिकेटर थे, जिन्होंने बताया था कि जब वो टीम में आए तो अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे. तब उन्होंने ट्यूटर रखकर अपनी अंग्रेजी सुधारी. उसके बाद तो वो अब जिस तरह अंग्रेजी बोलते हैं, उससे लगता ही नहीं कि कभी वो इससे डरा करते थे.

वैसे टीम इंडिया का हिस्सा रह चुके यजुवेंद्र चहल से धोनी और विराट कोहली से लेकर चेतेश्वर पुजारा तक यही स्थिति रही है. मोहम्मद शमी या पृथ्वी शॉ अंग्रेजी में पैदल थे. मौजूदा टीम भी इससे अलग नहीं है.

जब ये सभी खिलाड़ी मीडिया के सामने आते थे तो इस तरह से कांफिडेंस और फर्राटे से अंग्रेजी बोलते थे कि कभी ऐसा लगा ही नहीं कि वो एक जमाने में इसमें कमजोर थे.

मैचों के दौरान अब जब कमेंटेटर्स उनके रिएक्शंस लेते हैं तो बगैर झिझक इस तरह अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलते हैं कि किसी को अंदाज भी नहीं होता कि करियर के शुरुआत में वो इस भाषा में बहुत तंग थे. अंग्रेजी बोलने में उन्हें झिझक होती थी.

जब कपिलदेव टीम में आए थे
कपिल देव जब भारतीय क्रिकेट टीम में आए थे तो उन्हें लंबे समय तक इंटरनेशनल दौरों में मीडिया से बात करने के दौरान अंग्रेजी की झिझक का सामना करना पड़ा. फिर उन्होंने इसके लिए बकायदा एक प्राइवेट ट्यूटर लगाया था.

ढाई तीन दशक पहले तक छोटे शहरों या मामूली बैकग्राउंड से नेशनल टीम में आने क्रिकेटरों के लिए अंग्रेजी भाषा बड़ा हौवा थी. उन्हें सबसे बड़ा डर यही लगता था कि वो प्रेस कांफ्रेंस का सामना कैसे करेंगे. लेकिन अब ऐसा नहीं होता.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

उमेश यादव और हार्दिक पांड्या नहीं बोल पाते थे इंग्लिश 
उमेश यादव और हार्दिक पांड्या जैसे क्रिकेटर जब टीम इंडिया में सेलेक्ट किए गए, तो उन्हें इंग्लिश से इस कदर डर लगता था कि वो प्रेस कॉन्फ्रेंस और रिपोर्टरों से बात करने से कन्नी काटते थे कि कहीं उनसे अंग्रेजी में सवाल ना पूछ लिया जाए. पिछले दिनों लोग इस बात पर हैरान हो रहे थे कि यजुवेंद्र चहल इतनी अच्छी अंग्रेजी कैसे बोलने लगे हैं.

मौजूदा भारतीय क्रिकेट टीम या पिछले 10-15 सालों की भारतीय टीम में तमाम ऐसे क्रिकेटर आए जो  दसवीं भी पास नहीं हैं लेकिन अब वही जब वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं तो हैरानी होती है कि ऐसा कैसे हो गया. इसके पीछे आखिर क्या राज है.

केवल यही नहीं आमतौर पर टीम इंडिया में कम ही क्रिकेटर होंगे, जो ग्रेजुएट भी हों. ज्यादातर अपनी पढ़ाई हाईस्कूल या इंटर करते हुए बीच में ही छोड़ देते हैं.

बीसीसीआई सिखाता है इंग्लिश लेंग्वेज
दरअसल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) पिछले कुछ सालों से इस पहलू पर खास ध्यान देता रहा है. वो ऐसे सभी क्रिकेटरों के पर्सनालिटी डेवलपमेंट और इंग्लिश स्पिकिंग के सेशन आयोजित करता है. उन्हें इसके लिए दौरों में भी कोच उपलब्ध कराए जाते हैं. साथ ही फोन के जरिए भी इंग्लिश स्पीकिंग सुधारने में मदद की जाती है.

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बीसीसीआई इस बात पर खास ध्यान देता है कि टीम इंडिया में सेलेक्ट होने वाले क्रिकेटर अच्छी अंग्रेजी बोल सकें

बीसीसीआई का खास ध्यान
बीसीसीआई खास ध्यान देता है कि टीम इंडिया में जिन क्रिकेटरों का चयन किया जा रहा है वो न केवल तरीके से अंग्रेजी बोल सकें बल्कि उनका पर्सनालिटी डेवलपमेंट भी हो.

बीसीसीआई मानता है कि भारतीय क्रिकेटरों को मीडिया ब्रीफिंग के अलावा विदेशी दौरों में लोगों से मिलना जुलना होता है, कई तरह के समारोहों में हिस्सा लेना होता है, लिहाजा अंग्रेजी भाषा की प्रवीणता उसकी पर्सनालिटी और आत्मविश्वास को और बेहतर करेगी.

एमएस धोनी को इस सीज़न की सबसे इनोवेटिव थिंकिंग के लिए पुरस्कार से नवाज़ा गया. (BCCI)एमएस धोनी जब शुरू में टीम में आए तो उन्हें भी अंग्रेजी बोलने में समस्या होती थी लेकिन जल्दी ही उन्होंने इसे दूर कर लिया

धोनी भी नहीं बोल पाते थे अंग्रेजी
महेंद्र सिंह धोनी जब शुरुआत में टीम में आए तो उनके साथ भी यही समस्या थी लेकिन फिर उन्होंने साथी खिलाड़ियों के जरिए अपनी इंग्लिश को सुधारा.

वीरेंद्र सहवाग और प्रवीण कुमार जैसे क्रिकेटर तो लंबे समय तक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही जाने से बचते थे और अगर जवाब देते भी थे तो हिन्दी में देते थे और बीसीसीआई का इंटरप्रेटर या मैनेजर उन्हें बताता था कि सवाल में क्या पूछा गया है. प्रवीण कुमार तो अक्सर राहुल द्रविड़ को खुद के बदले आगे कर देते थे.

अंपायरों को भी अंग्रेजी सिखाता है बीसीसीआई
बीसीसीआई केवल क्रिकेटरों ही नहीं बल्कि भारतीय अंपायरों के लिए भी पिछले कुछ सालों से इंग्लिश लेंग्वेज प्रोग्राम शुरू किया है ताकि अंग्रेजी भाषा में उनकी बातचीत का स्तर सुधर सके, वो इंटरनेशनल प्लेयर्स से इंटरेक्ट कर सकें. पहली बार अंपायरों के लिए बीसीसीआई ने वर्ष 2015 में ऐसा कोर्स शुरू किया था.

क्या है उस कोर्स में
अंपायरों को इंग्लिश सिखाने के लिए बीसीसीआई ने जो कोर्स शुरू किया था, वो पांच दिन का था, इसमें अंपायरों को कई बैचों में बांटा गया था. इस कोर्स को बीसीसीआई ने इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल के साथ ब्रिटिश काउंसिल की मदद से तैयार किया था.

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अंग्रेजी में तंग क्रिकेटर टीम इंडिया में आते ही कैसे हो जाते हैं इसके एक्सपर्ट

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