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हिंदू धर्म में कई नियम हैं. इन नियमों का कारण अगर जानने की कोशिश करेंगे, तो पाएंगे कि हर नियम के पीछे एक खास स्टोरी है. इसी में से एक है, मौत के वक्त मरते हुए इंसान से उसके दामाद को दूर रखना. लेकिन क्यों?
ससुर के आखिरी समय में दूर रहता है दामाद (इमेज- फाइल फोटो)शादी के बाद हर दामाद को अपने ससुर से बहुत प्यार और सम्मान मिलता है. लेकिन जैसे ही ससुर की तबीयत गंभीर होती है और मौत का समय नजदीक आता है, अचानक सारे नियम बदल जाते हैं. दामाद को ससुर के कमरे में घुसने से रोक दिया जाता है. अगर गलती से भी पैर छू लिए तो घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं चिल्ला पड़ती हैं. आखिर क्यों?
उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक के हिंदू परिवारों में आज भी यह परंपरा सख्ती से निभाई जाती है. आखिर इसकी वजह क्या है? क्यों मरते हुए ससुर से उसके दामाद को दूर रखा जाता है. आज हम आपको बताते हैं इसकी वजह.
जम से जुड़ा है रिश्ता
पुराने लोग बताते हैं कि “जमाई” शब्द ही अपशगुनी है. दामाद को भारत में जमाई भी कहा जाता है. जमाई यानी जम + आई यानी यम आ गया! यानी जिस घर में जमाई आता है, वहां यमराज भी उसके पीछे-पीछे चले आते हैं. ये मान्यता हजारों साल पुरानी है. ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी लोग कहते हैं कि अगर मरने वाले के पास दामाद बैठ जाए या उसका पैर छू ले, तो उसकी उम्र तुरंत खत्म हो जाती है. यमदूत को जैसे ही दामाद दिखता है, वो समझ जाते हैं कि “अब समय पूरा हो गया, प्राण ले लो. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश के गांवों में तो यह नियम और भी सख्त है. जब ससुर अंतिम सांस ले रहे हों, दामाद को घर से बाहर तक भेज दिया जाता है. कई घरों में तो दामाद को 11-13 दिन तक घर में घुसने तक नहीं दिया जाता, क्योंकि मानते हैं कि जमाई का साया भी मृत आत्मा को परेशान करता है. लेकिन क्या है इस मान्यता का असली कारण?
लोक कथाओं पर आधारित है मान्यता
वैदिक काल और पुराणों में इसका कोई सीधा उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोककथाओं और बुजुर्गों की कहानियों में दो-तीन वजहें सामने आती हैं:
जमाई-यम वाला शब्द-खेल
संस्कृत और प्राकृत भाषा में “जमाई” शब्द का उच्चारण “यम-आई” जैसा लगता था. धीरे-धीरे यह मान्यता बन गई कि दामाद का नाम लेते ही यमराज कान खड़े कर लेते हैं. सबसे रोचक और डरावनी वजह ये भी है कि दामाद को उम्र खींचने वाला माना जाता है. बुजुर्ग बताते हैं कि दामाद नई पीढ़ी का प्रतिनिधि होता है. उसकी उम्र शुरू हो चुकी है, जबकि ससुर की उम्र खत्म होने की कगार पर है. अगर दोनों एक साथ आ जाएं तो “नई उम्र” पुरानी उम्र को खींच लेती है. मतलब ससुर की बची-खुची सांसें भी दामाद “ले” लेता है. इसी डर से दामाद को दूर रखा जाता है. आज के डॉक्टर और नई पीढ़ी इसे महज अंधविश्वास मानती है. लेकिन गांव देहात में आज भी 90% घरों में यह नियम मानते हैं. कई जगह तो दामाद को अंतिम संस्कार में भी शामिल होने से पहले विशेष पूजा करानी पड़ती है ताकि “यम का प्रभाव” खत्म हो जाए.
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न्यूज 18 में बतौर सीनियर सब एडिटर काम कर रही हूं. रीजनल सेक्शन के तहत राज्यों में हो रही उन घटनाओं से आपको रूबरू करवाना मकसद है, जिसे सोशल मीडिया पर पसंद किया जा रहा है. ताकि कोई वायरल कंटेंट आपसे छूट ना जाए.
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