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डेंगू और चिकनगुनिया से हर साल हजारों लोग मरते हैं, लेकिन मलेशिया ने इस बार मच्छरों को मारने के बजाय उन्हें “हैक” करने का अनोखा तरीका अपनाया है. राजधानी पुत्रजया में सरकार ने नवंबर 2025 से एक हैरान करने वाला अभियान शुरू किया, जो अब चर्चा का विषय बन गया है. यहां शहर की सड़कों पर जानबूझकर 65,000 नर मच्छर छोड़े गए हैं लेकिन ये कोई साधारण मच्छर नहीं हैं. इन सभी में वोल्बैकिया (Wolbachia) नाम का एक खास बैक्टीरिया इंजेक्ट किया गया है.
क्या है ये वोल्बैकिया?
वोल्बैकिया एक प्राकृतिक बैक्टीरिया है जो कई कीड़ों में पाया जाता है, लेकिन एडीज एजिप्टी (डेंगू फैलाने वाला मुख्य मच्छर) में स्वाभाविक रूप से नहीं होता. जब इस बैक्टीरिया वाले नर मच्छर जंगली मादा एडीज से संभोग करते हैं तो पैदा होने वाली नई पीढ़ी के अंडों में भी वोल्बैकिया चला जाता है. इसका नतीजा? ये नए मच्छर डेंगू, चिकनगुनिया, जीका या येलो फीवर वायरस को अपने शरीर में बढ़ने ही नहीं देते. यानी मच्छर तो काटेगा, लेकिन बीमारी नहीं फैलेगी. धीरे-धीरे पूरी आबादी “सुरक्षित मच्छरों” से बदल जाती है.
डेंगू से परेशान थे लोग
प्रधानमंत्री विभाग के अंतर्गत आने वाली प्रॉपर्टी मैनेजमेंट डिवीजन (BPH) ने फेसबुक पर बताया कि ये 65,000 मच्छर पुत्रजया के दो सरकारी आवास परिसरों में छोड़े गए हैं. अभियान 21 नवंबर 2025 से शुरू होकर 12 जनवरी 2026 तक चलेगा. हर हफ्ते हजारों की संख्या में नर मच्छर छोड़े जा रहे हैं. अगस्त 2025 में पुत्रजया में देश का पहला वोल्बैकिया इंसेक्टेरियम भी खोला गया, जो अब इन खास मच्छरों की सप्लाई कर रहा है. कुआलालंपुर और पुत्रजया की स्टेट हेल्थ डायरेक्टर दातिन डॉ. हलीजा अब्दुल मनाफ ने बताया कि ये तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है. ना इंसानों पर कोई असर, ना पर्यावरण को कोई नुकसान. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इसे डेंगू नियंत्रण की सबसे प्रभावी बायोलॉजिकल विधि मानता है.
कई देशों में इस्तेमाल होती है तकनीक
डेंगू पर कंट्रोल की ये तकनीक दुनिया में इंडोनेशिया के योग्यकार्ता, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, ब्राजील जैसे कई देशों में इस्तेमाल होती है. इस तकनीक से डेंगू के मामलों में 70-90% तक की कमी आई है. मलेशियाई सरकार ने साफ किया कि सिर्फ नर मच्छर छोड़े जा रहे हैं, जो काटते ही नहीं है. मादा मच्छर अभी भी लोगों को काटेंगी, इसलिए घरों में पानी ना जमा होने देना, फॉगिंग और पुराने तरीके भी जारी रहेंगे. वोल्बैकिया सिर्फ एक अतिरिक्त हथियार है, विकल्प नहीं है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का कहना है कि ये तकनीक लंबे समय तक असर करती है. एक बार जंगली आबादी में वोल्बैकिया फैल जाए तो सालों तक डेंगू का प्रकोप कम रहता है. मलेशिया ने 2019 से छोटे स्तर पर प्रयोग शुरू किए थे, अब पुत्रजया को पूरी तरह पूरी तरह वोल्बैकिया जोन बनाने की योजना है. भारत में भी इस तकनीक पर काम चल रहा है. ICMR और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (TIGS) बेंगलुरु में इसी तरह के प्रयोग कर रहे हैं. अगर मलेशिया सफल होता है तो आने वाले सालों में भारत के शहरों में भी “डेंगू-रोधी मच्छर” छोड़े जा सकते हैं.
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