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दीपक पांडेय/खरगोन. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में विंध्याचल पर्वत की तलहटी में स्थित पांडव कालीन मां आशापुरी माता मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है. उन्हीं में से एक है यहां की वह परंपरा, जिसमें सप्ताह में दो दिन मंगलवार और गुरुवार पूरे मंदिर की कमान बच्चों के हाथों में होती है. सफाई से लेकर पूजा, आरती, भोग और भक्तों की सेवा गांव के बच्चे पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ निभाते हैं. यह दृश्य देखने पर हर कोई भाव विभोर हो जाता है.
महेश्वर तहसील के आशापुर गांव में स्थित यह मंदिर पांडव कालीन बताया जाता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी लोकप्रियता बच्चों की सक्रिय भूमिका के कारण और बढ़ी है. सुबह सूरज निकलते ही बच्चों की टीम मंदिर पहुंच जाती है. सबसे पहले वे पूरे परिसर की सफाई करते हैं, सीढ़ियों से लेकर गर्भगृह तक हर कोना चमकाते हैं. इसके बाद देवी का श्रृंगार तैयार किया जाता है, फूलों की थाल सजाई जाती है और दीपक तैयार किए जाते हैं. यह सब बच्चे बड़े उत्साह और जिम्मेदारी के साथ करते हैं, जैसे किसी बड़ी सेवा का अवसर मिला हो.
क्यों शुरू हुई परंपरा?
मंदिर समिति त्रिलोक यादव के अनुसार, इस परंपरा को शुरू करने का उद्देश्य बच्चों में सेवा भाव, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और धार्मिक संस्कार विकसित करना था. और आज यह पहल पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गई है. बच्चों की आयु 8 साल से 15 साल के बीच होती है. छोटी उम्र के बावजूद वे हर काम इतनी गंभीरता से करते हैं कि बड़े भी देखकर हैरान रह जाते हैं. कई भक्त कहते हैं कि इन दो दिनों में मंदिर का माहौल और भी पवित्र, अनुशासित और ऊर्जा से भरा महसूस होता है.
शाम की आरती क्यों है खास?
शाम की आरती सबसे खास मानी जाती है. बच्चे ढोलक, घंटी, शंख और मंजीरे के साथ सामूहिक रूप से आरती करते हैं. उनकी मीठी आवाज़ और उत्साह से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है. इसके बाद भक्तों को प्रसाद वितरण की व्यवस्था भी बच्चे खुद संभालते हैं. मंदिर के पट बंद होने तक उनकी यह जिम्मेदारी जारी रहती है. बच्चों को देखकर कई परिवार अपने बच्चों को भी इस सेवा से जोड़ने के लिए प्रेरित होते हैं.
कितना पुराना है मंदिर?
मंदिर में लगी शिलालेखों के अनुसार, यहां पहले माता गुफा में विराजित थीं. करीब 800 साल पहले मंदिर का प्रथम जीर्णोद्धार हुआ और वर्ष 2012 में इसे भव्य स्वरूप प्रदान किया गया. आज मंदिर परिसर में मां आशापुरी के साथ महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती, सात मातृका, नवग्रह, गणेश, शिव और भैरव की भी प्रतिमाएं स्थापित हैं. यह राजा मांधाता की कुलदेवी रही हैं, जिनके वंशज आज भी यहां पूजन-अर्चन के लिए आते हैं. इसके साथ ही पृथ्वीराज चौहान सहित मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के 28 गोत्रों के लोग माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं.
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