[ad_1]
Last Updated:
आज हम आपको बिहार के पश्चिम चम्पारण ज़िले में स्थित एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जिसे किसी इंसान ने नहीं, बल्कि खुद प्रकृति ने गढ़ा है. स्थानीय निवासी बताते हैं कि मंदिर की चहारदीवारी को उठाने के लिए खूब प्रयास किया गया, लेकिन जब भी निर्माण कार्य शुरू हुआ तब कई प्रकार की अड़चनें आईं और खड़ी हो चुकी दीवारें आपरुपी ढह गईं.
पश्चिम चम्पारण: आज हम आपको बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में स्थित एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जिसे किसी इंसान ने नहीं, बल्कि खुद प्रकृति ने गढ़ा है. स्थानीय निवासी बताते हैं कि मंदिर की चहारदीवारी को उठाने के लिए खूब प्रयास किया गया, लेकिन जब भी निर्माण कार्य शुरू हुआ, तब कई प्रकार की अड़चनें आईं और खड़ी हो चुकी दीवारें आपरुपी ढह गईं. हालात कुछ ऐसे हो चुके थें कि मानो जैसे प्रकृति खुद नहीं चाहती हो कि ईश्वर के निवास स्थान को इंसानों द्वारा तैयार किया जाए. समय बीतता गया और श्रद्धालु खुले में ही शिव लिंग रूप में विराजमान महादेव की पूजा करते रहें. धीरे-धीरे शिव लिंग के चारों तरफ वट वृक्ष ने अपना घेरा बनाया. एक समय ऐसा आया जब वट वृक्ष ने ही अपनी गोद में मंदिर का निर्माण कर डाला.
बिहार में प्राचीन है मंदिर की मान्यता
जिले के बगहा 02 प्रखंड अंतर्गत आने वाले तरवलिया गांव में स्थापित यह मंदिर आज देश भर के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है. स्थानीय निवासी 75 वर्षीय ब्रज भूषण यादव बताते हैं कि सैकड़ों वर्षों से यह वृक्ष और उसमें स्थापित शिवलिंग यहां मौजूद है. गांव के बुजुर्ग वर्षों से अपने वंशजों को इस मंदिर की विशेषता और निर्माण से जुड़ी कहानी सुनाते आ रहे हैं. ब्रजभूषण ने भी अपने पिता और दादा से महादेव के इस खास मंदिर की कहानी सुनी है. उनका कहना है कि तरवलिया गांव में सैकड़ों वर्ष पहले एक संत रहा करते थे, जिनका नाम हरिनाथ था.
बेहद चमत्कारी है मंदिर की मान्यता
हरिनाथ एक सिद्ध पुरुष थे. जिनके लिए महादेव और मां आदिशक्ति की भक्ति ही सबकुछ थी. एक दिन संत हरिनाथ ने गांव से पैदल ही बनारस तक का सफर तय किया. गांव लौटते वक्त वह अपने सिर पर रखकर एक शिवलिंग लाएं. गांव लौटने के कुछ समय बाद बाबा ने समाधि ले ली. समाधि लेने के बाद उनके शिष्य संत उमा गिरी ने समाधि पर ही शिवलिंग को स्थापित कर पूजा स्थल बना दिया. स्थल निर्माण के बाद जब ग्रामीणों ने उसे चहारदीवारी के अंदर लाने का प्रयास किया, तब खड़ी की गई दीवार आपरूपी ढहने लगीं. ग्रामीणों की मानें तो, हर बार ऐसा ही हो जाता था
इंसान नहीं, खुद प्रकृति ने किया है निर्माण
ऐसी स्थिति में एक दिन संत उमा गिरी ने सपना देख कि वहां मंदिर का निर्माण प्राकृतिक रूप से होना है. कोई भी व्यक्ति भवन निर्माण की कोशिश न करे. इसके बाद उसे वैसे ही छोड़ दिया गया, जिसे कुछ समय के बाद वट वृक्ष ने अपने अंदर समाहित कर लिया. तब से लेकर आजतक वह स्थान वट वृक्ष की पनाह में सुरक्षित है, जहां हर दिन स्थानीय लोग पूजा करने आते हैं.
About the Author
मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें
[ad_2]
Source link