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इस साल अगस्त में ‘शोले’ के 50 साल पूरे हुए. आज फिल्म को सिनेमाघरों में री-रिलीज किया गया. फिल्म अनकट वर्जन के साथ रिलीज हुई. इसके क्लाइमैक्स में गब्बर को मरते हुए दिखाया गया है. फिल्म उस वक्त ब्लॉकबस्टर हुई थी. बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ‘शोले’ को एक जोखिम भरा दांव मानकर रिजेक्ट कर दिया गया था. कई लोगों का मानना था कि यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को बर्बाद कर देगी. लोगों को लगता था कि इतने बड़े बजट की फिल्म अगर बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होगी, तो मेकर्स को भारी नुकसान होगा.

‘शोले’ की बढ़ती लागत को लेकरट्रेड सर्किल्स में चिंता थी, जैसा कि आज ‘बड़े मियां छोटे मियां’ या ‘गेम चेंजर’ जैसी फिल्मों के साथ देखा जाता है. इंडस्ट्री के लोगों को यकीन था कि इतना खर्च इंडस्ट्री को डुबो देगा और निर्माता कंगाल हो जाएंगे. जब ‘शोले’ रिलीज हुई, तो ये डर सही साबित होते दिखे. ओपनिंग वीकेंड फीका रहा. थिएटर खाली रहे, टिकट बिक्री कम रही और शुरुआती रिव्यूज बेहद खराब थे. अखबारों ने फिल्म को फ्लॉप घोषित करने में देर नहीं लगाई और कहा कि निर्माता अपनी लागत कभी नहीं निकाल पाएंगे.

निर्देशक रमेश सिप्पी ने बाद में बताया कि इंडस्ट्री में लोग खुशी मना रहे थे. डिस्ट्रीब्यूटर, एग्जिबिटर और प्रोड्यूसर खुश थे कि उनका अंदेशा सही निकला. सबको राहत मिली कि महंगी फिल्म नहीं चली. सिप्पी के मुताबिक, कई लोगों ने खुलकर कहा, “अच्छा हुआ बड़ी फिल्म नहीं चली.” हालात इतने खराब थे कि सिप्पी ने एक बार फिर क्लाइमैक्स बदलने का सोचा. फिल्म का क्लाइमैक्स तीसरी बार बदलता. लेकिन राइटर सलीम खान और जावेद अख्तर ने घबराने से इनकार कर दिया. उन्हें भरोसा था कि फिल्म को ऑडियंस जरूर मिलेगी, भले ही इसमें वक्त लगे. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)

सालों बाद सिद्धार्थ कन्नन से बातचीत में रमेश सिप्पी ने उस मुश्किल दौर को याद किया. रमेश सिप्पी ने बताया कि कैसे प्रेस ने शुरुआत में फिल्म की आलोचना की और कहा कि बेकाबू बजट इंडस्ट्री को बर्बाद कर देगा. लेकिन कुछ ही हफ्तों में माहौल बदल गया. सिप्पी ने कहा, “पांच हफ्ते बाद, उन्होंने अपनी सारी बातें वापस ले लीं.” (यूट्यूब वीडियोग्रैब)
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रमेश सिप्पी ने कहा कि वही अखबार जिन्होंने फिल्म को फ्लॉप बताया था, मान गए कि वे गलत थे. ‘शोले’ ने न सिर्फ लागत निकाली, बल्कि बॉक्स ऑफिस का इतिहास बदल दिया. फिल्म की लागत भी चर्चा का बड़ा कारण थी. जो प्रोजेक्ट 1 करोड़ में शुरू हुआ था, वह बढ़कर 3 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. उस समय के हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम थी. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)

रमेश सिप्पी ने बताया कि 1970 के दशक के मध्य में 1 करोड़ रुपये आज के करीब 100 करोड़ रुपये के बराबर होते. ट्रेड के लोगों को ये आंकड़े गैरजिम्मेदाराना लगे. सबको लगता था कि फिल्म का इतना बड़ा स्केल इंडस्ट्री के लिए खतरा है. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)

‘शोले’ की मुश्किलें सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं थीं. सेंसर बोर्ड ने फिल्म के क्लाइमैक्स में दखल दिया और बदलाव करवाए. असली वर्जन में गब्बर सिंह की मौत होती है, लेकिन बोर्ड ने आपत्ति जताई कि एक पुलिस अफसर, जिसे संजीव कुमार ने निभाया, स्क्रीन पर किसी की जान ले रहा है. रमेश सिप्पी के मुताबिक, विरोध करना बेकार था. “यह इमरजेंसी का दौर था. आप बहस नहीं कर सकते थे.” (यूट्यूब वीडियोग्रैब)

डायरेक्टर को बेंगलुरु भेजा गया और अंत को फिर से शूट कराया गया, जिसमें गब्बर की मौत की जगह उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई. आधे सदी बाद, रमेश सिप्पी ने आखिरकार वह बदलाव वापस ले लिया, जिसे करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया था. ‘शोले’ के री-रिलीज में अब वही क्लाइमैक्स दिखाया गया है, जिसे दर्शकों से छीन लिया गया था. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)

रमेश सिप्पी ने कहा, “मुझे बहुत बुरा लगा जब मुझे क्लाइमैक्स बदलने के लिए कहा गया. सेंसर को क्यों बताना चाहिए कि मुझे अपनी फिल्म कैसे बनानी है?” फिल्म का असली वर्जन सिर्फ एक सीन नहीं बदलता. यह उस रचनात्मक यात्रा को पूरा करता है, जिसे डर, नियंत्रण और हालात ने बीच में रोक दिया था. जो फिल्म कभी अपने निर्माताओं को तोड़ने वाली थी, वही आज इस बात का सबूत है कि विश्वास आलोचना से बड़ा होता है और हर महानता की शुरुआत संदेह के साए में होती है. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)
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