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छतरपुर: सस्ते होने के बावजूद भी नहीं बिक रहे पत्थर के सिल-बट्टे और चकरी, जानिए वजह

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छतरपुर जिले में पत्थर से बने सिल-बट्टे, हुरसा और चकरी पहले हर घर में मिल जाता था, लेकिन बढ़ती मशीनीकरण से आज सिल बट्टे का मार्केट कम हो गया है. पीढ़ियों से पत्थर के सिलबट्टे और चकरी का धंधा करने वाले इस पीढ़ी के सदस्य राजपाल अब घाटा खा रहे हैं.

महोबा निवासी राजपाल लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि हम पत्थर से सिलबट्टे, चकरी, हुरसा, बेलन जैसे बर्तन पीढ़ियों से बना रहे हैं. सालों से यहां के क्षेत्रीय मेलों में अपनी दुकान लगाते आए हैं. पहले इस पत्थर के धंधे में फायदा होता था लेकिन अब बढ़ते मशीनीकरण से पत्थर के बर्तनों को खरीदने में लोग रुचि कम ले रहे हैं.

गांवों में कम हुई चकरी की डिमांड
राजपाल बताते हैं कि घर-घर में मिक्सी हो गई. अब ज्यादातर लोग मसाला सिलबट्टा में नहीं पिसते हैं. पहले शहर- गांव के लोग सिलबट्टा खरीदते थे, लेकिन अब ये धंधा ग्रामीण क्षेत्रों में ही सीमित हो गया है. किसानों की फसलें अच्छी होती हैं तो धंधा चलता है, नहीं तो मंदा रहता है. पहले ग्रामीण इलाकों में चकरी की डिमांड रहती थी, लेकिन अब गांवों में भी मांग कम हो गई है.

चकरी, सिलबट्टे के ये हैं दाम 
सिलबट्टे की क़ीमत की बात करें तो 200 से लेकर 300 रुपए में सिल और बट्टा दोनों मिल जाते हैं. वहीं हुरसा (चकला) की कीमत 100 रुपए है. इसके अलावा चकरी की कीमत 400 रुपए है.

पत्थर के सिल बट्टे बनाने में लगती है मेहनत
राजपाल बताते हैं कि इतने भारी सामान को यहां से वहां करने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. ये धंधा बहुत ही मेहनत मांगती है. इस काम में बहुत मेहनत लगती है. लाने-ढोने में भाड़ा खर्च भी बहुत लगता है.
पन्ना खदान से आए हुए पत्थर से सिलबट्टा बनाते हैं. साथ ही ग्वालियर से चिकना वाला पत्थर लाते हैं. हमारे यहां राजस्थान से पत्थर नहीं आता है.

Tags: Local18, Mp news

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