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तकदीर ने छीना एक बेटा, दूसरे को बनाया विक्षिप्त! डलिया बनाकर कर रहे जीवन यापन… जानें इस दंपति की दर्दनाक कहानी

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Chhatarpur News : छतरपुर जिले के बहरा गांव के रहने वाले बुजुर्ग शिवराम अहिरवार जिन्हें जीवन में बड़े दुःख मिले लेकिन फिर भी अपने जीवन में मुस्कराते रहते हैं. शिवराम के दो पुत्र थे लेकिन एक का देहांत हो गया है. दूसरा मानसिक विक्षिप्त है….और पढ़ें

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शिवराम

शिवराम अहिरवार अपनी पत्नी के साथ 

छतरपुर. जिले में के रहने वाले शिवराम जिनकी उम्र लगभग 60 साल हो गई है. जीवन में इतने दुःख मिले लेकिन फिर भी अपने जीवन को अपनी पत्नी के साथ खुशनुमा बना रखा है. शिवराम बताते हैं कि मेरे दो पुत्र थे लेकिन एक का देहांत हो गया है. दूसरा मानसिक विक्षिप्त है.

लोकल 18 टीम सड़क से जब गुजर रही होती है तभी टीम की नजर ऐसे बुजुर्ग दंपति पर पड़ती है जो खेत में अपने बैल-बकरी चरा रहे होते हैं और साथ ही किसी लकड़ी से डलिया बना रहे होते हैं. जब उनसे बात करते हैं तो उनके जीवन के संघर्ष की कहानी बाहर निकलकर आती है. बुजुर्ग शिवराम लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि ‘घर से सुबह निकलकर यहां आ जाते हैं. यहीं बैल-बकरी चरते रहते हैं. साथ ही खाली समय में यहीं मिलने वाले पेड़ों से डलिया बना लेते हैं.’ 

डलिया बनाकर खुद ही घर खर्च चलाते हैं 
आगे उन्होंने बताया कि ‘घर में कमाने वाला कोई नहीं है, हम दो ही जनों की मेहनत से घर खर्च चलता है. हमारे दो संतानें भी थीं. लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे शादीशुदा लड़के की मौत हो गई है. वहीं दूसरा जवान लड़का मानसिक रुप से बीमार है. वह हमारे सहारे ही है. इस बुढ़ापे में लड़के सहारा बनते हैं लेकिन लड़का खुद ही हमारे सहारे है. हम दोनों मेहनत करते हैं ताकि घर खर्च चल सके और बच्चे का भी पेट भर सके. जीवन में यही मिलना था. यही सोचकर हंसते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं. अपना दुःख हम किसी से नहीं बताते.’

शिवराम बताते हैं कि ‘पिछले 40 सालों से हम गुलचटार पौधे से मजबूत डलिया बना रहे हैं. छोटे से लेकर बड़े साइज के टिपार हम बनाते हैं. यहां की क्षेत्रीय भाषा में इसे डलिया, टिपार, गुलइया और टोकरी भी बोलते हैं.’ 

आसानी से मिल जाते हैं पौधे 
शिवराम बताते हैं कि डलिया बनाने के लिए यहां आसानी से यह पौधा मिल जाता है. गुलचटार से लेकर दूसरे पौधों के भी टिपार बन जाते हैं. सहेरु, ऐंठ और अरहर की खड़ियों से भी डलिया बन जाते हैं.

ग्रामीण इलाकों में रहती हैं ज्यादा डिमांड 
शिवराम बताते हैं कि छतरपुर जिले में इन टिपारों की मांग बहुत रहती है. खासकर, ग्रामीण इलाकों में इनकी मांग ज्यादा रहती है. किसान परिवार सबसे ज्यादा ये डलिया खरीदते हैं. क्योंकि अनाज से लेकर भूसा तक भरने में ये काम आते हैं. साथ ही शादी जैसे कार्यक्रमों में पूड़ी-लड्डू रखने के लिए ये टिपार काम आते हैं.

शिवराम बताते हैं कि इन डलियों का भाव इनकी साइज के अनुसार रहता है. हालांकि, बड़े साइज के ही ज्यादातर डलिया बनाते हैं. सामान्य तौर पर इनका रेट 100 रुपए से लेकर 250 रुपए तक रखते हैं.

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