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मुंगेर: ये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बिहार है भैया! जहां 15 सालों से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था अर्थी पर पहुंच चुकी है. प्राइवेट अस्पतालों की स्वास्थ्य व्यवस्था पैसे के लिए बेशर्म हो चुकी है. ऐसा हम नहीं बिहार के मुंगेर से सामने आई आयोग के आदेश के आप भी कह सकते सकते हैं. जिला उपभोक्ता संरक्षण एवं प्रतितोष आयोग ने शहर के एक प्रतिष्ठित सर्जन डॉ. सुधीर कुमार को लेकर सुनाई है . सामने आई रिपोर्ट ने इन्हें गरीबों की जान का सौदा कर पैसे लूटने वाले डॉक्टर बता दिया.
दरअसल, पूरा मामला यह है कि पेट दर्द की साधारण शिकायत पर किशोर परिजनों के साथ इनके हॉस्पिटल में ईलाज के लिए पहुंचा था. जहां इन्होंने पूरे पेट में चीरा लगाने के साथ ही गलत सर्जरी से किशोर की लान लेने की कोशिश की. आगे सात साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पीड़ित परिवार को आखिरकार इंसाफ मिला है.
दरअसल, पूरा मामला जमालपुर सदर बाजार धर्मशाला रोड निवासी समर शेखर के बेटे से जुड़ा है. कोर्ट रिपोर्ट के मुताबिक एक अगस्त 2019 को किशोर को तेज पेट दर्द की शिकायत हुई. परिजन उसे इलाज के लिए डॉ.सुधीर कुमार के क्लीनिक पर लेकर पहुंचे. जांच के बाद सर्जन ने अपेंडिसाइटिस का शक जताते हुए अगले ही दिन लेप्रोस्कोपिक सर्जरी कर दी. लेकिन दावा किए गए अपेंडिक्स ऑपरेशन की यह सर्जरी असफल रही. अपेंडिक्स था या नहीं इसकी भी पुष्टि नहीं हुई. आगे आरोप है कि इसके बाद डॉक्टर ने अभिभावकों की सहमति लिए बिना अचानक किशोर के पूरे पेट में बड़ा चीरा लगा दिया. पांच दिन बीत गए, लेकिन बच्चे की हालत में सुधार नहीं हुआ. उल्टा दर्द और बुखार बढ़ता गया. परिजनों ने डॉक्टर पर दबाव बनाया तो उन्होंने जल्दबाजी में बिल वसूलकर मरीज को रेफर कर दिया. परिवार बच्चा को भागलपुर के एक निजी अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने कहा पहली सर्जरी गलत हुई है, इलाज यहां संभव नहीं.
भागलपुर में जवाब मिलने के बाद परिजन उसे तेजी से कोलकाता ले गए. वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों ने बताया कि पहली सर्जरी इतनी गलत थी कि बच्चे की आंत में छेद तक हो गया था और अपेंडिक्स का हिस्सा सही तरह नहीं निकाला गया था. कोलकाता में दोबारा ऑपरेशन कर बच्चे की जान किसी तरह बचाई गई. इस गंभीर उपचार पर परिवार ने 8 लाख रुपये से अधिक खर्च किए. इसी के बाद पीड़ित परिवार ने 28 नवंबर 2019 को उपभोक्ता आयोग में वाद दायर किया.
आयोग ने कहा-यह मेडिकल नहीं, अमानवीय प्रयोग जैसा था
मामले की सुनवाई करते हुए आयोग के अध्यक्ष रमण कुमार सिंध ने डॉक्टर को कठघरे में खड़ा किया. आयोग ने कहा आवश्यक जांच किए बिना सिर्फ आभास के आधार पर ऑपरेशन करना यह दर्शाता है कि डॉक्टर मरीज पर प्रयोग कर रहे थे. यह आचरण अमानवीय है. आयोग ने डॉक्टर को आदेश दिया कि वह इलाज पर लगे 8.50 लाख रुपये छह प्रतिशत ब्याज सहित लौटाए. शारीरिक व मानसिक पीड़ा के लिए 2 लाख रुपये दे. वाद सखर्च के रूप में 50 हजार रुपये चुकाए. बच्चे के शरीर को “फेस्टमार्टम की तरह चीरकर विकृत” करने के लिए 5 लाख रुपये प्रतिकर दे. कुल मिलाकर डॉक्टर को 16.51 लाख रुपये चुकाने होंगे. अगर तय समय में राशि नहीं दी गई तो 9% वार्षिक ब्याज भी देना पड़ेगा.
डॉक्टर की सफाई, परफोरेशन का शक था, इसलिए पेट खोला
डॉ. सुधीर कुमार ने अपनी लिखित सफाई में कहा कि अपेंडिक्स परफोरेशन का आभास होने पर पेट खोला गया था. उनका दावा है कि आंत पर किवीनस फ्लेक जमा था और अपेंडिक्स के आसपास फिक्स जैसा फ्लूइड. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कोलकाता में हुए ऑपरेशन में आंत के छेद को बंद किया गया. अपेंडिक्स का शेष हिस्सा निकाला गया. इन्होंने मेडिकल भाषा में आयोग को भी गुमराह करने की कोशिश की.
7 साल बाद मिला इंसाफ, परिवार ने ली राहत की सांस
इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने कहा कि यह लड़ाई आसान नहीं थी, लेकिन अब भरोसा बढ़ा है कि चिकित्सा लापरवाही के मामलों में न्याय मिलता है. आयोग के फैसले से यह भी संदेश गया है कि गलत सर्जरी या लापरवाही अब डॉक्टरों पर भारी पड़ेगी.
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