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prithviraj kapoor cousin ravindra kapoor struggle story did only supporting roles in bollywood movies| कपूर खानदान का बदनसीब एक्टर, नहीं बन सका बॉलीवुड का हीरो, सपोर्टिंग रोल्स में ही सिमट गया पूरा करियर

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ये बात किसी से छुपी नहीं है कि बॉलीवुड में कपूर खानदान का दबदबा है. इस परिवार से अब तक कई टॉप हीरो-हीरोइन निकले हैं. लेकिन इस फैमिली का एक मेंबर कभी हीरो नहीं बन पाया. सपोर्टिंग रोल्स में ही करियर सिमट गया. यहां तक कि कई बड़ी फिल्मों में काम किया, लेकिन कभी लीड रोल नहीं मिला. हालत ये थी कि दर्शक उन्हें देखकर पहचान जाते थे, लेकिन नाम नहीं जानते थे.

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कपूर खानदान का बदनसीब एक्टर, सपोर्टिंग रोल्स में ही सिमट गया पूरा करियररविंद्र कपूर को पूरे करियर में नहीं मिला हीरो का रोल.

नई दिल्ली. कपूर खानदान ने हिंदी सिनेमा को कई सारे सुपरस्टार दिए. इसकी हर पीढ़ी ने फिल्मों में अपने हुनर का जलवा बिखेरा और खूब नाम कमाया है. पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक, इन सभी ने फिल्मी दुनिया में काम करते हुए दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई. लेकिन इस खानदान में एक ऐसा शख्स था, जो कभी अपनी पहचान नहीं बना सका. हम जिनकी बात कर रहे हैं, उनका नाम है रविंद्र कपूर.

रविंद्र कपूर, पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई और जाने-माने कैरेक्टर आर्टिस्ट कमल कपूर के भाई थे. रविंद्र कपूर ने फिल्मों में चार दशक से ज्यादा समय तक काम किया, लेकिन उनके कई किरदार इतने छोटे और बिना नाम के थे कि दर्शक अक्सर उन्हें पहचान तो लेते थे, लेकिन नाम नहीं जान पाते थे.

कपूर खानदान का बदनसीब एक्टर

रविंद्र कपूर का जन्म 15 दिसंबर 1940 में हुआ था. फिल्मी परिवार में जन्म होने के बावजूद उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा. उन्होंने साल 1953 में ‘ठोकर’ फिल्म से अभिनय की शुरुआत की. इसके बाद वह ‘पैसा’ (1957) जैसी फिल्मों में भी छोटे रोल में नजर आए. उस समय उन्हें हिंदी फिल्मों में ज्यादा मौके नहीं मिले, इसलिए उन्होंने पंजाबी सिनेमा की ओर रुख किया. पंजाबी फिल्मों में उन्होंने अपनी पहली बड़ी सफलता 1960 में आई फिल्म ‘चंबे दी कली’ से पाई. यह फिल्म हिट हुई और उन्हें कई सम्मान भी मिले.

हिंदी सिनेमा में नहीं मिली पहचान

हिंदी सिनेमा में वापसी के बाद रविंद्र कपूर ने कई बड़ी फिल्मों में काम किया. वे ‘यादों की बारात’, ‘आया सावन झूम के’ और ‘कारवां’ जैसी सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा रहे. खासकर ‘कारवां’ में उन्होंने जितेंद्र के दोस्त का किरदार निभाया, जो दर्शकों को काफी पसंद आया. लेकिन उनके इन किरदारों का नाम अक्सर क्रेडिट रोल में भी नहीं दिखाया गया. कभी-कभी उनका किरदार इतना छोटा होता था कि उनका नाम तक नहीं था.

सपोर्टिंग रोल्स में सिमट गया करियर

ऐसे में दर्शक उन्हें देखने के बाद चेहरा तो पहचानते थे, लेकिन नाम याद नहीं रहता था. यही रविंद्र कपूर के करियर की सबसे बड़ी चुनौती रही. उनकी फिल्में हर साल आती रहीं, लेकिन वह अक्सर सपोर्टिंग रोल तक ही सीमित रहे. 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने ‘मंजिल मंजिल’, ‘द बर्निंग ट्रेन’ और ‘कयामत से कयामत तक’ जैसी फिल्मों में भी काम किया. इन फिल्मों की सफलता के बावजूद उनका नाम चर्चा में नहीं आया. यह भी सच है कि राज कपूर की कंपनी आरके फिल्म्स में भी उन्हें कभी काम करने का मौका नहीं मिला. इस वजह से रविंद्र कपूर हमेशा एक प्रतिभाशाली लेकिन गुमनाम अभिनेता की तरह रहे.

1991 में रिलीज हुई थी रविंद्र कपूर की आखिरी फिल्म

उनके करियर में पुरस्कार या बड़े सम्मान नहीं आए, लेकिन उनका योगदान फिल्मों में महत्वपूर्ण रहा. उन्होंने 1980 तक फिल्मों में काम किया और अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. उनकी आखिरी फिल्म ‘बेनाम बादशाह’ (1991) थी. इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे इंडस्ट्री से दूरी बना ली. रविंद्र कपूर ने कभी टीवी शो नहीं किए और उनका फोकस हमेशा फिल्मों पर रहा. रविंद्र कपूर का निधन 70 साल की उम्र में 3 मार्च 2011 को हुआ.

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Kamta Prasad

साल 2015 में दैनिक भास्कर से करियर की शुरुआत की. फिर दैनिक जागरण में बतौर टीम लीड काम किया. डिजिटल करियर की शुरुआत आज तक से की और एबीपी, ज़ी न्यूज़, बिज़नेस वर्ल्ड जैसे संस्थानों में काम किया. पिछले 6 सालों से …और पढ़ें

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कपूर खानदान का बदनसीब एक्टर, सपोर्टिंग रोल्स में ही सिमट गया पूरा करियर

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